Monday, 15 January 2018

अहसासों की दुनियाँ में 
अधिकारों को रहने दो 
चुंधिया गई हैं आँखें तो 
अंधियारों को रहने दो 
मेरी वेदना को छोड़ों पर
सरोकारों को रहने दो
तुम निर्मम सत्ता हो पर
बेढंगे आकारों को रहने दो
*
रामकिशोर उपाध्याय

Wednesday, 6 December 2017

आओ झोले से कुछ ख्वाब निकाले


*
आओ झोले से
कुछ ख्वाब निकाले
चलो फिर दुखिया की ओर
कुछ मुस्कान उछाले
साँझ से पहले
बचाले दीप के उजाले
धूप की डिबिया में
रात का सारा  काजल छिपा ले
आओ झोले से
कुछ ख्वाब निकाले ..............
*
रामकिशोर उपाध्याय

Saturday, 2 December 2017

बस एक ही शब्द #########


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यदि तू हां कहे 
तो जीत लूं धरती और पर्वत 
और बना लूं एक पर्ण कुटीर
जहाँ हम हो और हो मादक समीर
झूमती हर दिशा हो जाये कह-कह कर अधीर
बस एक ही शब्द
प्रेम .......
*
गर तू हां कहे ........
तो लिख डालूं इस गगन पर
और भर दूँ काग़ज सारे कोरे -कोरे
ढूँढती रहे निशा चांदनी में जिसे चाँद के धोरे -धोरे
बस एक ही शब्द
प्रेम ....................
*
रामकिशोर उपाध्या

अजीब शर्त

न वादे, न कसमें 
न वफ़ा, न जफ़ा 
न हम उन्हें बाँध पाए 
न वो आज़ाद रह पाए 
मिले तो मुकद्दर 
न मिले तो खली नहीं तन्हाई
मोहब्बत ने यह ताउम्र
कैसी अज़ीब शर्त निभाई
*
रामकिशोर उपाध्याय

Sunday, 26 November 2017

यह तुम भी जानते हो ----------------------



यह तुम भी जानते हो 
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तुम्हारी दुआओं में कब
शामिल हुआ मेरा हिस्सा 
फकत तुम्हारी कालीन 
बनकर रह गया मेरा किस्सा 
जिसके नीचे खिसकाते रहे 
तुम मुझको हमेशा 
ये मेरा हौसला ही था 
जो वक्त की नमी पा 
बन गया बिरवा वट का 
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रामकिशोर उपाध्याय

Thursday, 29 June 2017

क्योंकि मैं साक्षी हूँ -------------------


जब आप दिखा रहे थे स्वरुप विराट 
कुछ समय के लिए मैं ढूंढ रहा था ठाट 
जब आप मुख में दिखे लिए ब्रह्माण्ड 
हे कृष्ण ! उस समय मन हो रहा था खंड-खंड
क्यों सखे ?
आप उस दिन आज दिखा रहे थे ,,
मैं आज (जो आपका कल था ) को देख रहा था
सच ,जो देख रहा था कह नही सकता
अब तो प्रभु आप भी उसे गीता में नहीं उद्धृत कर सकते
तुमने कहा था हम सब धर्म के लिए मरे और जिए
मगर यहाँ आदमी अधर्म के लिए मर और जी रहा है
क्या यहीं आधुनिक अर्थ है 'वासंसी जीर्णानि यथा विहाय'का ?
क्या इस मशीन मानव का यही युगधर्म है ?
मैं उस दिन कम ,परन्तु हूँ आज अधिक किंकर्तव्यविमूढ़
आज भी युद्ध के लिए होना चाहता हूँ आरूढ़
मगर आज मेरे रथ के पहिये धंस गये हैं
कर्म में नही कीचड में फंस गये हैं
अब और युद्ध नही ...
समय के दुर्योधन को संधि -पत्र लिख रहा हूँ
मगर यह मेरी नहीं है कायरता
हां ,पापी अवश्य हूँ क्योंकि मैं साक्षी हूँ ..........
हे अर्जुन ! उदास मत हो..... यह नहीं है कर्मयुग
यहाँ मानव की शब्दावली में प्रमुख है ''राज'' ...
मगर कौन सा ?
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रामकिशोर उपाध्याय

Wednesday, 21 June 2017

मध्यान्ह का सूर्य


एक  दिन दोपहर  मिली
बड़ी बुझी -बुझी
अपने ही कन्धों पर झुकी -झुकी
ऐसा क्यों ?
रथ  का पहिया कभी उलटा चला था
उसे उसके  सारथी ने ही छला था
क्या करती ..
धूप के लूटने का डर था
आदमी की नज़र में भ्रमर था
फूलों के पथ में बिछे थे अंगारे
नही कोई था जो नाम को पुकारे
बस कंधे झुकाकर सांझ का लबादा ओढ़ लिया
और दोपहर को आँखों में भींच लिया
लाठी के साथ पाँव बाँध लिए
बस इसी तरह उम्र काट लिए
और मध्यान्ह का सूर्य बिलखता रहा ........
*
रामकिशोर उपाध्याय